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Mala Srivastava


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खुद को सताने में अब, मज़ा आता है

Posted On: 2 Nov, 2015  
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कविता में

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चले आओ यूही अब मुलाकात करना चाहती हूँ !

Posted On: 9 Nov, 2014  
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कविता में

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शासक और उसके गुण व कर्तव्य – Leadership is doing what is right even when no one is watching.

Posted On: 12 Aug, 2012  
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आज के दौर में ये आपका या मेरा ही प्रशन नहीं है की मै या हम किस उम्मीदवार या पार्टी को अपना वोट दे, सबसे अहम् प्रशन तो ये उठता है की हम वोट क्यों दे, जैसा कि हमारे देश के संविधान मै लिखित है कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र मे इस देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने व कहने का नागरिक अधिकार है, और लोकतान्त्रिक व्यवस्था होने के नाते हर एक हिन्दुस्तानी नागरिक को वोट देने के लोकतान्त्रिक अधिकार है, और लोकतान्त्रिक अधिकार होने के नाते मै अपने अधिकार का प्रयोग बहुत ही सोच समझ के साथ अपनी पूरी तर्क शक्ति का प्रयोग करते हुए ही करना चाहूँगा, क्योकि एक आजाद देश के और लोकतान्त्रिक व्यवस्था मै रहने वाले नागरिक कि हैसियत से ये मेरा नैतिक और मौलिक अधिकार बनता है कि मै अपने लोकतान्त्रिक/संवैधानिक अधिकार का प्रयोग देश हित मै ही करू. ये तो हुई बात देश हित मै परन्तु अब जब देश हित कि बात चल रही है तो आज के राजनैतिक परिवेश को देखते हुए व हमारे प्रिये लुटेरे नेतागणों के दिन दहाड़े काले सफ़ेद कारनामे देखने के बाद मेरा स्वयं का विश्वास अपने देश के न्यायिक, लोकतान्त्रिक व संवेधानिक प्रणाली से उध गया है तो अब एक बार फिर ये हमारे देश के ठेकेदार नेता लोग चुनाव का फेस्टिव सीजन ले केर आ गए, या हम सीधे सीधे ये कह सकते है कि " खादी पहन कर नेता हमे लूटने और बेवकूफ बनाने आ गए, अब ये हमारी अक्ल पर भी निर्भर करता है कि ६३ साल से लगातार बेवकूफ और मूर्ख बनने के बाद अभी और कितने साल हम गलती पर गलती करते रहेंगे? हमको आज अभी, इसी वक्त इस यक्ष प्रशन को सुलझाना होगा और इस का समाधान रूपी उत्तर भी हम को ही निकलकर अपने पास रखना होगा ताकि भूतकाल मै कि गयी गलतिया वर्तमान मे नहीं होनी चाहिए और भविष्य के लिए हम अपना हिम मार्ग प्रशस्त कर सके, ताकि कोई भी राजनैतिक पार्टी एंड उसका नेता हमको "भोली भाली जनता कहने का सहस न कर सके"

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प्रिय भाई , साहब , आपका दैनिक जागरण में प्रकाशित "पाठकनामा" में "आज का दौर " पड़ा ,बहुत अच्छा लगा मै अपना " शहीद भगत सिंह" को समर्पित एक लेख आपको भेज रहा हूँ कि किस तरह शहीदों के बलिदान को उपेक्षित कर ये सत्ता और अंग्रेजों के दलाल आज की सत्ता पर कुंडली मारकर बैठ गए हैं इनकी शोषण की नीतियों की वजह से आज का आम आदमी का जीना कितना मुश्किल हो गया है ,कि लोग आत्महत्या तक करने को मजबूर हो रहे हैं ,अब तक 250000 से अधिक संख्या में किसान आत्महत्या कर चुके है ,परन्तु इन सत्ता के दलालों के पास उनके लिए सहानुभूति का एक शब्द तक नहीं है ,शरद पावर पर एक थप्पड़ लगता है तो सारे नेता किस तरह एक हो जाते हैं यह इनके चरित्र को दर्शाता है आज आवश्यकता है एक क्रांति की.इसकेलिए हमें आपसी मतभेद ,जाति- पांति ,उंच-नीच , छुआ-छूत आदि सब कुछ भूलकर एक हो जाना होगा तभी यह संभव हो सकेगा आशा है आप उत्तर देंगे निर्मल कुमार शर्मा फ़ोन नो 09910629632

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"लोगों को आपस में लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत होती है . गरीब मेहनतकश व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं ,इसलिए तुम्हे इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कर कुछ न करना चाहिए .संसार के सभी गरीबों के ,चाहे वे किसी जाति,रंग ,धर्म या राष्ट्र के हों , अधिकार एक ही है . तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म ,रंग , नस्ल ,और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो . इन यत्नों में तुम्हारा नुक्सान कुछ नहीं होगा , इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएँगी और तुम्हे आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी "-----शहीद भगत सिंह [ जून १९२८ में " किरती " में छपा लेख ] " कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है .हमारी रसोई में नि:संग घूम सकता है लेकिन एक इंसान का हमसे स्पर्श हो जाये तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है .सरस्वती -पूजा वाले दिन ,सरस्वती की मूर्ति का जुलूस निकलना जरुरी है और उसमें आगे -आगे बैंड-बजा बजना भी जरूरी है .लेकिन रास्ते में एक मस्जिद भी आती है इस्लाम धर्म कहता है की मस्जिद के आगे बजा न बजे .अब क्या होना चाहिए ? हिन्दू का हक़ कहता है कि बाजार में बाजा बजाते हुए भी जाया जा सकता है .इस्लाम धर्म में गाय का बलिदान जरूरी है .हिन्दू धर्म में गाय पूजनीय मानी गयी है . तो यही दर्शन व रस्मों -रिवाज के छोटे -छोटे भेद बाद में जाकर राष्ट्रिय धर्म बन जाते हैं और अलग -अलग संगठन बनाने का कारण बनाते हैं . परिणाम हमारे सामने है " " अलग-अलग संगठन और खाने -पीने का भेद-भाव मिटाना जरूरी है .छूट-अछूत शब्दों को जड़ से निकलना होगा " उपर्युक्त उद्धृत लेख से स्पष्ट है कि भगत सिंह जाति, धर्म , ऊँच - नींच ,रंग , नस्ल आदि तुक्छ संकीर्णताओं से बहुत ऊपर उठ चुके थे अपितु वे तो राष्ट्रीयता की सीमाओं को भी मानने तैयार नहीं थे तभी तो उन्होंने लिखा कि "दुनिया के सारे गरीब और किसान लोग राष्ट्रीयता व देश के भेद भाव मिटाकर एक जुट हो जाओ " " लोकरुचि अथवा लोकोक्तियों के अनुसार जो अपना जीवन यापन करते हैं वे अपने पड़ोसियों की प्रशंसा के पात्र भले ही बन जाएँ पर उनका जीवन औरों के लिए नहीं होता है . संसार को जिन्होंने ठोकर मारकर आगे बढाया ,वे अपने -अपने समय में लांछित हो चुके हैं . दुनिया खाने -पीने ,पहनने-ओडने तथा उपयोग करने की वस्तुओं का व्यापार करती है पर कुछ दीवाने चिल्लाते फिरते हैं ,"सरफरोसी की तमन्ना अब हमारे दिल में है !" . संसार को जिन्होंने ठोकर मरकर आगे बढाया ,वे अपने -अपने समय में लांछित हो चुके हैं . दुनिया खाने -पीने ,पहनने-ओडने तथा उपयोग करने की वस्तुओं का व्यापार करती है पर कुछ दीवाने चिल्लाते फिरते हैं ,"सरफरोसी की तमन्ना अब हमारे दिल में है !" ऐसे कुशल किन्तु औघड़ व्यापारी भी देखे हैं ? अगर एक बार आप -हम उन्हें देख लें , तो कृत्कृत हो जाएँ .हाँ दुनिया में आजकल व्यवहारवाद की बड़ी धूम है .सब कोई अपनी डेड़ अंगुल की व्यव्हार बुध्ही को उचकते फिरता है . व्यवहार क्या चीज है? फूंक-फूंककर कदम रखना ,खतरे से सौ कोस दूर रहना और मौका पड़ने पर चापलूसी करना दुनिया की दृष्टि में बुध्हिमत्ता है .इसी को लोग चतुरता कहते हैं .सारांश यह है कि व्यावहारिकता का दूसरा नाम कायरता है "----अमर शहीद भगत सिंह का 1930 में लिखा गया "वे " नाम से लिखे गए एक दुर्लभ लेख से उधृत अब आज के हालत पर विचार करें भगत सिंह के उक्त उधृत विचारधारा से इस देश के हुक्मरानों को कुछ लेना-देना नहीं है आज उंच -नीच ,जातिवाद ,छुवा-छूत ,शोषण ,कुव्यवस्था ,भ्रस्टाचार,आदि ने आम जनता का जीना मुहाल कर रखा है . पूंजीवाद के दलाल इस तथाकथित प्रजातान्त्रिक कुव्यवस्था के खिलाफ उक्त वर्णित साजिशों से जनता में फूट डालकर अपना जुल्म किये जा रहे हैं .दुनिया में जिस तरह कई देशों में जिस प्रकार जुल्म के खिलाफ जनता सडकों पर उतर आई है .यहाँ उसका नामों-निशान नहीं है . क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि हम इस देश के सभी लोग अपना सभी भेद-भाव मिटाकर इस अत्याचारी शासन व्यवस्था के विरूद्ध एकजुट होकर संघर्ष करे जिन्होंने उस अम शहीद के विचारों को आम जनता से अबतक छुपाये हुई है और सत्ता उन दलालों के हाथ में है जो वास्तव में देश को स्वतन्त्र कराते समय अंग्रजों के दलाल के रूप में थे

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" खाली पेट वाले व्यक्ति के लिए तमाम नैतिक आदर्शों और धर्मों का कोई मतलब नहीं है और उसके लिए भोजन ही ईश्वर है . नैतिकता और धर्म उस व्यक्ति के लिए थोथे शब्द हैं जो आजीविका का जुगाड़ करने के लिए गंदे नाले में खाना तलाशता है ,और जाड़े की रात में कड़ाके की शीतलहरी से बचने के लिए सडकों पर पीपों के पीछे पनाह लेता है" - होरेस ग्रीले को उधृत करते हुए भगत सिंह ने लिखा " स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज आकाओं को उखाड़ फेंकने के बाद सत्ता की चाभी राजे -रजवाड़ों ,नबाबों ,सामंतों ,पूंजीपतियों,और सूदखोरों के हाथ में रहेगी ,ये तत्व उस समय ( स्वतंत्रता संग्राम के समय ) भारत में ब्रिटिश सत्ता के सबसे बड़े पिछलग्गू और सामाजिक आधार थे और जनता का शोषण करने और उसे दबाने - कुचलने में उनका साथ देते थे ,साम्राज्यवाद के इन चाकरों को दूर किये बिनाभारत की आजादी सिर्फ अमीरों ,संप्रदायवादियों ,दलालों-गद्दारों और अमीर तबकों के लिए रह जाएगी और ९५ प्रतिशत गरीब और कमजोर लोगों को इससे कुछ नहीं मिलेगा "--शहीद भगत सिंह " जब गतिरोध की स्थिति लोगों को ( युवावों को ) अपने शिकंजे में जकड लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं . इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत है , अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है.लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रस्ते पर ले जाने में सफल हो जातीं हैं. इससे इंसान और राष्ट्र की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है . इस परिस्थिति को बदलने के लिए जरूरी है कि क्रांति कि स्पिरिट ताजा की जाये ,ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो "---शहीद भगत सिंह " पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते ,बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है .आज देश को ऐसे निस्वार्थ और बहादुर नौजवानों की जरूरत है जो सामाजिक और आर्थिक क्रांति के लिए संगठनात्मक और दूसरे काम करें .इसलिए नौजवानों को इस क्रांति का हिरावल होना चाहिए जो अपने कार्यों और विचारों से आम जनता को झकझोर दें "---शहीद भगत सिंह "हम उस शोषित वर्ग के प्रतिनिधि हैं जो आबादी का 98 प्रतिशत है तथा हम भारत के स्वतंत्र होने के बाद देश के सभी मजदूरों और किसानों को सुखी देखना चाहते हैं "-----शहीद भगत सिंह " मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का समर्थन करने वाली सभी व्यवस्थाओं के उन्मूलन का हम समर्थन करते हैं "--- शहीद भगत सिंह "क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया ? हमें भिखारी बनाया तथा हमारा खून चूस लिया ? एक जाति और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है . क्या जनता अब भी चाहती है कि इस अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें ? हम बदला लेंगे ,जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा . कायरों को पीठ दिखाकर समझौता और शांति की आशा से चिपके रहने दीजिये .हम किसी से भी दया की भीख नहीं मांगते हैं और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगे ."---भगत सिंह [ करतार सिंह के नाम से २६ जनवरी ,१९३० को लिखा गया लेख ] उक्त सारे उदहारण इस लिए दिए गए कि इनसे भगत सिंह की विचारधारा और चरित्र का सही मूल्यांकन किया जा सके कि भगत सिंह की इस देश , इस देश की गरीबजनता,किसानों ,मजदूरों और आम जनता के प्रति उनकी क्या सोच थी . अब आज के हालत पर विचार करें ,आज देश को स्वतंत्र हुए ६४ साल बीत चुके हैं ,उपर्युक्त भगत सिंह के दिए हुए बयान लगभग ८१ या ८२ पूर्व में दिए हुए हैं .आज भी इस देश की जनता की हालत में कुछ भी सुधर नहीं हुवा है . आज अन्ना जी जैसे लोग आज के भ्रष्ट व्यवस्था के बिरुध्ह एक बहुत ही सार्थक बिगुल बजा दिए हैं . उनके आन्दोलन को कमजोर करने के लिए आज की भ्रष्ट व्यवस्था उनके खिलाफ अनर्गल आरोप प्रत्यारोप लगाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है . उनके सभाओं में कुछ प्रायोजित गुंडे तत्व "भगत सिंह क्रांति सेना " के नाम से गुंडागर्दी कर रहे हैं . उपर्युक्त भगत सिंह के विचाधारा से इन गुंडों का कोई तुलना है ? भगत सिंह जैसे अप्रतिम शहीद का नाम भी ये गुंडे बदनाम कर रहे हैं . इस देश के प्रबुध्ह लोगों को इस प्रकार की घटनाओं पर अपनी तीक्ष्ण दृष्टि रखनी होगी ओर अन्ना जी के आन्दोलन में मजबूती के साथ अपना योगदान देना चाहिए

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अन्नाजी ने राजनीति में अच्छे लोगों को ही वोट देने के लिए जनता से आह्वान क्या कर दिया सारे राजनैतिक दल बिलकुल तिलमिला गए हैं .क्या राजनैतिक दलों के नेताओं का यही लोकतंत्र है ? क्या अबतक वे इसी लोकतान्त्रिक मर्यादा की दुहाई देते रहे हैं ? आखिर अन्नाजी ने कौन सी गलत बात कह दिया कि सारे नेता बौखला गए हैं ? आजकल के ये तथाकथित नेता देश की ,समाज की भलाई के लिए चुनाव नहीं लड़ते हैं ,अपितु वे धन कमाने के लिए चुनाव जीतते हैं . अब इस देश की जनता का यह कर्त्तव्य है कि वे अन्नाजी का हर तरह से सहयोग करें तथा वे ऐसे लोगों को ही चुनाव में जितायें जो वास्तव में ईमानदार ,सच्चरित्र ,देशप्रेमी हों उन अपराधियों ,जमाखोरों,तस्करों और सत्ता लोलुपों को चुनाव में बिलकुल वोट न दें

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"क्रांति बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है .क्रांति से हमारा अभिप्राय है -अन्याय पर आधारित समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन "---भगत सिंह का ६ जून १९२९ को अदालत में दिया गया बयान साभार -क्रन्तिकारी भगत सिंह लेखक श्री सुरेश , दिल्ली , १९७१, पृष्ठ ९१-९२ आज वही सामाजिक क्रांति की जरुरत है .स्वतंत्रता के ६४ वर्षों के बाद भी इस देश की ७७% जनता की जिंदगी नरक बनी हुयी है जबकि किसानों से गेहूं खरीद कर उसे खुले में रख कर सडाकर जमीन में गाड दिया जाता है [ व्यवस्था का एक नमूना ] . इस शोषण को समाप्त करना है .यह इस देश के प्रबुद्ध युवकों को करना होगा .इस पावन कार्य के लिए युवा आगे आयें . इसके लिए इस तथाकथित लोकतान्त्रिक प्रणाली में सुधार की बहुत जरुरत है .चुनाव में उन भ्रष्ट , लालची ,अपराधी , माफिया ,तस्करों ,देशद्रोहियों ,असम्बेदंशील ,और गुंडे तत्वों को हरा कर ,उन नए युवा लोगों को चुनाव में जीताना होगा जो वास्तव में इस देश में खुशहाली और समानता लाना चाहते हैं . लोकतान्त्रिक प्रणाली में पुराने राजनैतिक दलों की कोई आवश्यकता नहीं है .नए युवा लोग जो स्वयं सच्चरित्र , इमानदार ,देशभक्त , कर्मठ , विचारशील ,प्रगतिशील हों निर्दलीय के रूप में चुनाव में खड़े हों ; जैसाकि अन्नाजी ने कहा है .इन नए युवा लोगों को जनता खुल कर समर्थन करे .अपराधी और माफियाओं के लोभ - लालच में जनता न आये . यह कार्य इतना आसान नहीं है . इसके लिए इस देश के युवा लोगों को [ चाहे वे कालेज के हों ,मेडिकल कालेज के हों ,इंजीनियरिंग कालेज के हों या यूनिवर्सिटी के हों ] जनसंपर्क करके गाँव -गाँव ,मोहल्ले -मोहल्ले , हर जगह जाकर जनता को जागरूक करना होगा , तभी यह मिशन सफल होगा और भगत सिंह का बलिदान सार्थक होगा --निर्मल कुमार शर्मा

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आरती लिए तू किसे ढूढता है मुरख , मंदिरों , राजप्रासादों में , तहखानों में , देवता कहीं सडकों पर मिटटी तोड़ रहे , देवता मिलेंगे खेतों में , खलिहानों में -- रामधरी सिंह दिनकर क्रांति की वेदी पर हम अपने यौवन को पूजा सामग्री के रूप मेंअर्पित कर रहे हैं ,क्योंकि ऐसेमहान आदर्श (देश को स्वतन्त्र कराने केलिए) कोई भी क़ुरबानी बड़ी नहीं है --- अमर शहीदभगत सिंह (फांसी की सजा सुनाये जाने से पूर्व दिया गया बयान). उक्त कथन भगत सिंह ने विशेषकर देश के नौजवानों को संबोधित करके कहा था उन्होंनेआगे कहा था ,कि संसार की क्रांतियों और परिवर्तनों के वर्णन छांट डालो , उनमे केवल ऐसे युवकही मिलेंगे ,जिन्हें बुध्हिमानों ने "पागल छोकरे "अथवा " पथ -भ्रष्ट "कहा है .परन्तु जो सिड़ी हैं , वे क्या खाक समझेंगे कि स्वदेशाभिमान क्या होता है ? आज अन्नाजी ने युवकों का आवाहन बहुत सोच समझ कर किया है . इस देश के युवक हीइस देश के कण कण में व्याप्त भ्रस्टाचार को मिटायेंगे . अब देशभक्त , इमानदार ,कर्मठ ,सचरित्र, युवा आगे आयें और अन्नाजी ने जो मशाल जलाया है ,उसे अपने मजबूत हाथों में लेकर उनकेइस कार्य को पूर्ण करें इसी में उनकी यौवन की सार्थकता है .

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शहीदे आजम भगत सिंह !!!!!!!!! एक ऐसा नाम जिसे सुनकर हर उस भारतीय का सर गर्व से तन जाता है जिसके मन में इस देश के लिए और इस देश के उन अमर शहीदों के लिए जरा भी सम्मान है .अब आपको हम एक ऐतिहासिक घटना के तरफ ले चलते हैं ,जिन दिनों अंग्रेज भगत सिंह पर फर्जी मुक़दमा चला रहे थे तब उन्हें भगत सिंह के खिलाफ दो गवाह चाहिए थे .इतिहास गवाह है बहुत प्रयत्न के बाद भी अंग्रेजों को इसमें बहुत दिनों तक सफलता नहीं मिली .बहुत प्रयत्नों के बाद उन्हें दो गवाह मिले [१]सर शोभा सिंह [२] सर शादी लाल .इन दोनों खलनायकों के गवाही के उपरांत भारत के उस लाल को अंग्रेजों ने फंसी पर लटका दिया . अब आपको वर्तमान भारत में लिए चलते हैं श्री खुशवंत सिंह अंग्रेजी के प्रसिध्ह स्तंभकार हैं क्या आपको पता है श्री खुशवंत सिंह जी उन्ही सर शोभा सिंह के सुयोग्य और यशस्वी पुत्र हैं .हमारे स्वच्छ छवि वाले प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी श्री खुशवंत सिंह जी के अच्छे मित्र हैं .अभी पिछले दिनों अखबारों में एक चौकाने वाला समाचार आया कि हमारे प्रधानमंत्री जी अपने मित्र श्री खुशवत सिंह से ये वादा किया कि वे दिल्ली में स्थित विंडसर प्लेस का नाम जल्द ही उनके यशस्वी पिता के नाम पर सर शोभा सिंह प्लेस कर देंगे . अब प्रश्न ये उठता है कि क्या हमारे प्रधान मंत्री श्री मनमोंहन सिंह जी का ज्ञान इतना कम है कि वे श्री खुशवंत सिंह किसके सुपुत्र हैं ये नहीं जानते ? और उन्के पिता श्री का इतिहास में क्या स्थान है ये नहीं जानते ? या वे भगत सिंह से अपरिचित हैं . अगर ऐसा हैं तो उनकी बुद्धि पर पूरे देश को तरस आती है .अगर नहीं तो ये सरेआम भगत सिंह जैसे अमर शहीदों का अपमान है ,इसे आप क्या कहेंगे ? इसका निर्णय आप स्वयं करें . इतिहास गवाह है कि जिन्होंने देश को स्वतंत्र करने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया उन्हें नेपथ्य में धकेल दिया गया .इस देश कि सत्ता उनको सौंप दी गयी जो अंग्रेजों के चाटुकार थे .क्रांतिकारियों और देश के अन्य देशभक्तों के प्रति गाँधी जी के विचार का एक नमूना आपको देना चाहता हूँ "कांग्रेसी नेता और गाँधी जी के शिष्य पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा है ,कि महात्मा गाँधी ने खुद विसरॉय से अपील कि थी कि अगर इन नौजवानों [भगत सिंह आदि को ]फंसी देनी ही है ,तो unha congress के karanchi adhiveshan शहीदे आजम भगत सिंह !!!!!!!!! एक ऐसा नाम जिसे सुनकर हर उस भारतीय का सर गर्व से तन जाता है जिसके मन में इस देश के लिए और इस देश के उन अमर शहीदों के लिए जरा भी सम्मान है .अब आपको हम एक ऐतिहासिक घटना के तरफ ले चलते हैं ,जिन दिनों अंग्रेज भगत सिंह पर फर्जी मुक़दमा चला रहे थे तब उन्हें भगत सिंह के खिलाफ दो गवाह चाहिए थे .इतिहास गवाह है बहुत प्रयत्न के बाद भी अंग्रेजों को इसमें बहुत दिनों तक सफलता नहीं मिली .बहुत प्रयत्नों के बाद उन्हें दो गवाह मिले [१]सर शोभा सिंह [२] सर शादी लाल .इन दोनों खलनायकों के गवाही के उपरांत भारत के उस लाल को अंग्रेजों ने फंसी पर लटका दिया . अब आपको वर्तमान भारत में लिए चलते हैं श्री खुशवंत सिंह अंग्रेजी के प्रसिध्ह स्तंभकार हैं क्या आपको पता है श्री खुशवंत सिंह जी उन्ही सर शोभा सिंह के सुयोग्य और यशस्वी पुत्र हैं .हमारे स्वच्छ छवि वाले प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी श्री खुशवंत सिंह जी के अच्छे मित्र हैं .अभी पिछले दिनों अखबारों में एक चौकाने वाला समाचार आया कि हमारे प्रधानमंत्री जी अपने मित्र श्री खुशवत सिंह से ये वादा किया कि वे दिल्ली में स्थित विंडसर प्लेस का नाम जल्द ही उनके यशस्वी पिता के नाम पर सर शोभा सिंह प्लेस कर देंगे . अब प्रश्न ये उठता है कि क्या हमारे प्रधान मंत्री श्री मनमोंहन सिंह जी का ज्ञान इतना कम है कि वे श्री खुशवंत सिंह किसके सुपुत्र हैं ये नहीं जानते ? और उनके पिता श्री का इतिहास में क्या स्थान है ये नहीं जानते ? या वे भगत सिंह से अपरिचित हैं ?. अगर ऐसा हैं तो उनकी बुद्धि पर पूरे देश को तरस आती है .अगर नहीं तो ये सरेआम भगत सिंह जैसे अमर शहीदों का अपमान है ,इसे आप क्या कहेंगे ? इसका निर्णय आप स्वयं करें . इतिहास गवाह है कि जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया उन्हें नेपथ्य में धकेल दिया गया .इस देश की सत्ता उनको सौंप दी गयी जो अंग्रेजों के चाटुकार थे .क्रांतिकारियों और देश के अन्य देशभक्तों के प्रति गाँधी जी के विचार का एक नमूना आपको देना चाहता हूँ "कांग्रेसी नेता और गाँधी जी के शिष्य पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा है ,कि महात्मा गाँधी ने खुद वायसरॉय से अपील कि थी कि अगर इन नौजवानों [भगत सिंह आदि ] को फांसी देनी ही है ,तो उन्हें कांग्रेस के करांची अधिवेशन के बाद नहीं बल्कि पहले ही फांसी दे देनी चाहिए "___हिस्ट्री ऑफ़ डी इंडियन नेशनल कांग्रेस ,खंड १,बाम्बे १९४६ ,पृष्ठ ४४२ .और भगत सिंह को २३ मार्च १९३१ को फांसी दे दी गयी . भगत सिंह चाहते थे कि देश की स्वतत्रता के बाद सभी लोग खुशहाल रहें शोषणमुक्त समाज का निर्माण हो परन्तु हुआ उसके ठीक उल्टा ६४ साल बाद शोषण और बढ़ गया . भगत सिंह ने लिखा है "ऐ भारतीय युवक !!!तू क्यों गफलत में सोया है उठ !आँखें खोल , देख ,प्राची दिशा का ललाट सिन्दूर _रंजित हो उठा ! अब अधिक मत सो ! सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रह !कापुरुषता के क्रोड़ में क्यों सोता हैं ? तेरी माता ,तेरी परत: स्मरणीय ,तेरी परम वंदनीया ,तेरी जगदम्बा ,तेरी अन्नपूर्णा ,तेरी त्रिशूलधारिणी , तेरी सिंह वाहिनी , आज फूट फूट कर रो रही है धिक्कार है तेरी निर्जिविता पर !! धिक्कार है तेरी नापुन्सत्व पर !! तो उठ कर माता के दूध की लाज रख ,उसके उध्हार की बीड़ा उठा , बोल मुक्त कंठ से भारत माता की जय , बंदेमातरम

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आज सॆ अस्सी साल पहलॆ एक 23 वर्षीय नौजवान नॆ उस समय के आजादी की लडाई को बहुत ही गम्भीऱता सॆ अध्ययन किया और कहा कि इस दॆश सॆ अग्रॆज निश्चतरुप सॆ चलॆ जायॆगॆ परन्तु इससॆ इस दॆश कॆ मजदूऱो और किसानॊ की स्थिति मॆ कॊई खास‌ परिवर्तन नही होगा क्योकि तबभी कॆवल 10% लॊगॊ कॆ पास दॆश की सारी सम्पत्ति पर कब्जा रहॆगा शॆष जनता वैसी ही भूखी और गरीबी मे ही जीनॆ कॊ अभिषप्त हॊग |अब आज की हालात पर विचार करॆ आज इस दॆश की 800000000 जनता भूखॊ सॊनॆ पर मजबूऱ है अब तक 250000 किसान आत्महत्या कर चुकॆ है|इस दॆश कॆ पूजीपाति,नॆता, तस्करॊ और बडे अफसरॊ कॆ पास इतनी सम्पत्ति है जिनकॊ आप लिख नही सकतॆ ________आज उस 23 वर्षीय नौजवान की अस्सी वर्ष purv की गयी भविष्यवाणी कितनी सत्य साबित हॊ रही है_______ जानतॆ है वॊ नौजवान कौन था ? वॊ नौजवान थॆ युवा सम्राट,अमर शहीद् भगत सिह्

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प्रधानमंत्री महोदय की अगर बात करे तो यह कहने बिलकुल अनुचित नहीं होगा की वह अभी भी पूर्ण रूप से एक अछे नौकरशाह है और सोनिया गाँधी द्वारा उन्हें प्रधान मंत्री बनाना उनकी इसी काबिलियत पर मुमकिन हुआ. किन्तु देश की व्यवस्था को सही प्रकार से चलाने के लिए अच्छे नौकरशाह के बजाय एक अच्छे राजनेता की आवशयकता होती है. किसी भी देश पर, राज्य पर या किसी भी अन्य ऐसे स्थान पर शासन करने के लिए सदा ही अच्छे शासक सफल रहते है, न की नौकरशाह. प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठने के लिए व्ही उपयुक्त हो सकते है जो स्वयं की राजनैतिक योग्यता और संघर्ष कर उस पद को बहुमत से प्राप्त करते है. http://singh.jagranjunction.com/2011/08/27/%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85/

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

PM को बीचमे क्यो लाते हो । आपको लगता है वो PM है ? नही, वो PM नही सीधे साधे सामान्य नौकर शाह है । PM बनने की प्रतिभा ही नही है । अच्छी नौकरी मिले ईसलिये चन्द्रशेखर जी ( असली PM ) के दरवाजे पर बैठा करते थे । नरसिन्हाराव ( असली PM ) के समय समय उसका नाम हुआ, नरसिन्हाराव और आर्थिक जगत के अच्छे सन्जोगो के कारण । जो भी अच्छा काम हुआ वो नरसिन्हाराव के कारण ही हुआ था । ये साहब तो राव सहब के चिठ्ठी के चाकर थे , राव साहब जो कहे वो करना था । बजेट पढने मे भी पसिना छुट जाता था । राव साहब के बाद चान्डाल चौकडी ने कोन्ग्रेस पर कबजा कर लिया । केसरी साहब को हटाके सोनिया को लाये । सोनिया को जबरजस्ती लाये और बाकी के कोन्ग्रेसियो को सोनिया के गुलाम बनाया गया । चान्डाल चौकडी सोनिया को सिखाती है क्या करना है , सोनिया दुसरे कोन्ग्रेसियो को । सोनिया को PM भी बना देते लेकिन सुब्रमणियम स्वामिने टान्ग मारी , नही बना सके । फिर किस को बनाये ? उनको असली PM तो चाहिये ही नही था । सिन्धिया और पाईलोट के बाद प्रणवबाबु ही थे जो असली PM बन सकते थे । लेकिन नही प्रणवबाबु ईस चान्डाल चौकडी के काबु से निकल जाते । खेल बिगड जाता । आज के PM का नाम हो गया था, ईज्जत भी बन गई थी, तन और मनसे नौकर शाह थे । सोचा गया की ये कभी गद्दारी नही करेन्गे हमेशा सोनिया और चान्डाल चौकडी के कहे अनुसार ही चलेन्गे । बस , बना दिया बकरा । आपको नही लगता की उन्हे बक्ष देना चाहिए ?

के द्वारा: bharodiya bharodiya

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माला जी बहुत ही सुन्दर विचार है आपके, भगवान राम के बारे में आपने जो विचार रखे है वाकई बहुत अच्छे है. आज के परिवेश में श्री राम और हुनमान जी जैसे गुण वाले व्यक्ति मिलने बहुत मुश्किल है. हां लेकिन राम के भेष में रावण शीघ्रता से मिल जायेंगे. धन, शक्ति और सत्ता की चाह तो आज का प्रत्येक मनुष्य रखता है और किसी भी कीमत में उसे प्राप्त करने के लिए सदा तैयार रहता है, यह प्रवृति तो रावण से प्रेरित लगती है. जबकि भगवान श्री राम ने धन और सत्ता का स्वयं ही त्याग कर दिया था, जबकि शक्तिशाली तो वह स्वयं थे ही किन्तु अनावश्यक रूप से कभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया, सर्व शक्तिशाली होते हुए भी किसी साधारण इंसान की भाति रावण से युद्ध कर सीता को प्राप्त किया. तभी श्री राम को मर्यादा परुशोतम राम भी कहा जाता है. इसके अलावा श्री राम में और भी कई गुण थे. वर्त्तमान समय में श्री राम का एक गुण apnakar श्री राम के चरित्र की बराबरी भी नहीं कर सकता क्योकि एक यदि श्री राम के गुणों को अपने जीवन में उतारना है तो पूरे के पूरे उतारने पड़ेंगे, आधे अदूरे से बात न बनेगी. यदि आधे श्री राम के गुण और आधे किसी और के तब राम के गुणों भी कोई अर्थ न होगा. उदहारण स्वरुप आप रावण को ही ले लीजिये, उसमे ऐसे क्या बुराई थी जो हर वर्ष दशहरे के अवसर पर जलाया जाता है? अहंकार, क्रोध एवं कट्टरपन. और अचाई क्या क्या थी कभी विचार कर देखेगे तो हैरान हो जाएँगे, बहुत बड़ा विद्वान था, अथाह शक्तिशाली था, काल को भी जीता हुआ था, ब्रहामन पुत्र, भगवान शंकर का अथाह भगत. इतने दैवीय गुण होने के बावजूद सिर्फ तीन अव्गूनो ने उसे इतिहास में बुराई का प्रतीक बना दिया. अंत में बस इतना कहना चाहुगा की इस धरती में या तो राम मिलेंगे या रावन. बीच के किसी व्यक्ति का कोई स्थान नहीं है. यदि राम बनना है तो पूर्ण रूप से राम हो सकते है और रावण तो रावण. आधा अधूरा राम मिलना असंभव है. read more articles http://singh.jagranjunction.com

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

माला जी आपने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है. यह भारत की सबसे बड़ी विडंबना है की जो देश के लिए अपनी जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार है आज उन्हें ही सरकार ने हाशिये में रख दिया है. भारतीय वायु सेना में तकनिकी खराबिया पायलेट की बेशकीमती जान तो लेती ही है, जो देश के लिए भविष्य में बहुत कुछ कर सकते थे किन्तु कुवयवस्थाओ के चलते बेवजह अपनी जान से हाथ धो बैठते है. वायु सेना के अलावा यदि हम थल सेना की और भी दृष्टि डाले तो वहां भी जवान राजनीति के कुचक्र में फसे मिलेंगे. युद्ध में अपनी जान की बाजी लगा यदि वह जीत हासिल कर भी आ जाते है तब उन्हें प्रमोशन और मैडल देकर इतिश्री कर दी जाती है और यदि कोई क्रिकेट प्लयेर विदेश में कुछ रन से जीत हासिल कर आता है तब उसे करोडो रूपए पुरस्कार स्वरुप दिए जाते है. सिर्फ इसलिए की गवर्मेंट को क्रिकेट से अरबो का बिज़नस मिलता है और आर्मी से नहीं. यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है. यदि देश में सेना में जवान ही नहीं होंगे तो दुश्मन के हाथो गुलाम होने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा भारतीयों को, तब न तो यह सरकार रहेगी और न ही होगा क्रिकेट का अरबो का बिज़नस इसलिए सेना है तो हम है, और हम है तो देश है, देश है तो सुबकुछ है... जय हिंद जय भारत

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

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हम अमेरिका को अमेरिका की नज़र से नही देख रहे है यानि वो कैसी नीतिया अपनाता है लोगो पर हावी होने के लिए.... हम सिर्फ उसका सबक सिखाने के ढंग की तारीफ कर रहे है .. यही spirit हमे पसंद है के जो हमे दुःख दे उससे उसका बदला लो ... ! बहुत से लोगो को लग रहा है के वो दूसरे देश में घुसे पर \'अपने शत्रुओ का मारना कोई गलत काम नही है\' , कुछ लोग कह रहे है के ओसामा को जिंदा भी तो पकड़ सकते थे उसे जानबूझ कर मारा गया \' तो जिसको mercy दिखानी है उनका देश की रक्षा में कोई काम नही है वो charity के कामो को करे ! \' आपको याद होगा जब कंधार में हमारा प्लेन हाई जैक हुआ था तो जो आतंकवादी छोड़े गये थे उनको भी ऐसे ही तुरंत खत्म कर दिया गया होता तो कोई बवाल ही नही होता .. छूटने के बाद वो क्या कर रहे है आपको पता ही है ..........

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

माला जी, अभिवादन, आपने सही कहा की राजनेता की उपयोगिता उसके निर्णय से होती है पर कभी कभी निर्णय उलटे पड़ते है तब........ यही कहा जाता है की क्या जरुरत थी यह सब करने की. आपने इंदिरा जी का ज़माना नहीं देखा जिस समय अमरीकन राष्ट्रपति ने पकिस्तान से मिल कर भारत के खिलाफ आक्रमण करवाया था. उस समय द्रण निश्चय के बलबूते इंदिरा जी ने देश को जीत दिलाई थी.और कई बार सीमाओ पर भी गयी थी. रही बात ओबामा की उपनिवेश्बाद की नीत पर चल रहे है वह २६/११ के बाद हिंदुस्तान ने हमेशा कहा की पाकिस्तान आतंकबाद का गड़ है तब समझ में नहीं आयी. जब पाकिस्तान ने अपने सहयोगी राष्ट्री से कहा की अमरीका से नाता तोड़ो और चीन से नाता जोड़ो, तब एक दम ओसामा मारा गया वह भी अन्तराष्ट्रीय सीमाओ को लांघ कर. इस तरह तो वह भारत में भी घुस कर हमला कर सकता है आज उसकी बारी है तो कल हमारी भी हो सकती है तो काम अच्छा किया पर तरीका नियाय संगत नहीं कहा जा सकता? बदिया टोपिक है पर बास्त्विकता की जमीन से हट कर फिर भी बधाई हो ?

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के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

माला जी, नमस्कार आपने अपने ये विचार माननीय ओबामा जी के इस नवीन कारनामे से प्रेरित होकर रखे है या कुछ और बात है . जहाँ तक मैं समझता हूँ की ओबामा जी ने इससे पहले तो शायद ऐसा गर्व करने वाला कार्य कभी नहीं किया . रही बात लादेन के खात्मे की तो वो मैं येही कहूँगा की वह सब अमेरिका की दमनकारी नीतिओं का ही एक हिस्सा है पूर्व की भांति. इससे आतंकवाद के विरूद्ध वाली कोई बात नहीं है यह तो उसने अपनी आत्मरक्षा हेतु किया गया कार्य है. हाँ इतना अवश्य है की जिस प्रकार से प्रत्येक इंसान मैं कोई न कोई बात ग्रहण करने योग्य होती है वैसे ही उनमे भी एक बात है. बाकी इस पूरे ऑपरेशन के सफल होने मैं वहां के देशवासिओं का पूरा योगदान रहा है, वहां हमारे देश की तरह किसी भी अछे कार्य मैं रूकावट डालने वाले देशभक्त नेताओं की आजतक कमी है. इसीलिए हमारे यहाँ कसाब जैसे लोग आज तक मेहमान बन कर मौज कर रहे हैं

के द्वारा: vivekvinay vivekvinay

माला जी, बिल्कुल सही बात की अपने - \" बंधा पैसा देना ज़रूरी है\" ठीक इसी तरह हर लेबल पे कुछ न कुछ पैसा बंधा हुआ है और हम सब ये बंधा पैसा देते हैं क्यूंकि हमे अपने काम से मतलब होता है हमारा काम होना चाहिए वो भी जल्दी से जल्दी हम सिर्फ अपने काम के बारे में सोचते हैं देश के बारे में नहीं हम सब यही सोचते हैं की भ्रष्टाचार मिटना चाहिए लेकिन हम उसे मिटाने की बजाये खुद बढ़ाते हैं दूसरी बात जो आपने कही कि - \"यहाँ कोई आम आदमी क्या कर सकता है \" तो आपको भी पता होगा प्रत्येक आदमी आम आदमी होता है परन्तु उसके कार्य उसे आम आदमी से ऊपर उठाते हैं और ज्यादा तो नहीं बोलूँगा लेकिन शायद आपने भी अन्ना हजारे जी के बारे में पढ़ा होगा वो भी एक आम आदमी ही थे लेकिन उनकी सोच और उनके कार्यों ने उन्हें आज कहाँ पहुंचा दिया है आप खुद देख सकती हैं और हाँ मै यहाँ आपको गलत नहीं बोल रहा बस भरष्टाचार के मुद्दे पे अपने विचार प्रगट कर रहा हूँ और मैंने जागरण junktion पे १५ अगस्त के दिन इसी मुद्दे पे एक लेख लिखा था आप हो सके तो उसे जरुर पढना और अपनी राय देना धन्यवाद

के द्वारा: Deepak Jain Deepak Jain

जहाँ संभव है वहा खुद को कोई सुधार सकता है पर हर जगह एक आम आदमी बन कर ये संभव नही हो पाता है ... जैसे हमारी एक परिचित की बंगलोर में नौकरी लगी और उसे ट्रेनिंग के बाद १ महीने की छुट्टी दे के सबको पासपोर्ट बनाने क लिए अपने-२ घरो को भेज दिया गया उसके पास सरे documents है सारी formalities पूरी कर ली है पर तब भी वहा का बंधा पैसा देना ज़रूरी है .. यहाँ कोई आम आदमी क्या कर सकता है जब अन्दर "खाने" का नियम ही है तो कौन सुनवाई करेगा वहा की supreme पॉवर के पास जाने की बात की जाये तो ये कोई आसान काम नही जब तक आपकी कोई अच्छी पहचान नही है! ... खुद आपके पास अगर पॉवर है तो आप ईमानदार रहने की कोशिश कर सकते है पर इस प्रकार के कई अवसरों एक आम आदमी होने के नाते किसी कोई पहचान नही होती यही व्यवहारिक बात है ! ऐसे हमारे पास और भी अनेक उद्धरण है !

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

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आप सही कह रहे मंत्री जन प्रतिनिधि होते है पर वर्तमान क परिद्रश्य के अनुसार कदम उठाने चाहिए ... चुनावो में चाहे वो किसी भी स्तर के होते है कैसे झंडे खड़े होते है , चुनाव कैसे जीता जाता है ये सब ही जानते है ! तो उनको कर्मो पर जन प्रतिनिधि होने के कारण पर्दा नही डाल सकते है ! ...... ........ और कमल दुर्लभ हो गये है ये हम भी मानते है पर उन दुर्लभो को दुर्लभ होने का खामियाज़ा न भुगतना पड़े इसका ख्याल रखना बहुत आवश्यक है ! हमारे साथ के सब लोग भी बिना झिझक ये कहते है के इतनी मेहनत से प्रतियोगिता की तैयारी क्यों कर रहे है रिश्वत मिलेगी तो लेंगे .. हमे survive करने के लिए भी ऐसा करना पड़ेगा और जो settle है वो ऐसा करते भी है !

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

माला जी , आज जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार की बात करता है वो या तो सारा इल्जाम नेताओं पे लगा देता है और थोडा मोड़ा जो बचता वो सरकारी महकमे पे जड़ देता है लेकिन कोई भी व्यक्ति कभी भी इसके लिए खुद को दोषी नहीं मानता मेरा मत तो ये है की आज प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने स्तर पे भ्रष्टाचार में लिप्त है जिसे जो मौका मिलता है उस स्तर पे भ्रष्टाचार करता है आज हमे ट्रेन में सफ़र करते हैं और सीट नहीं मिलती तो हम टी टी . को पैसे देकर सीट लेते हैं क्या ये भ्रष्टाचार नहीं क्या हम रिश्वत खोरी को बढ़ावा नहीं देते ये तो सिर्फ एक उदाहरण है ऐसे अनेक काम हैं जो हम रोज करते हैं और रिश्वत खोरी को बढ़ावा देते हैं तो उम कभी खुद को सुधरने की बात क्यूँ नहीं करते क्यूँ नहीं हम निचले स्तर से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करते क्यूँ हम सिर्फ नेताओं और अधिकारीयों को भ्रष्ट बताते हैं ये मेरी अपनी राय है दीपक जैन रायगढ़ (छ. ग.)

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माला जी सुन्दर विषय उठाया आप ने इस लिए धन्यवाद वैसे कुछ हद तक तो आप का ड्राफ्ट सही है लेकिन होता क्या है हो क्या रहा है आज आप देख चुकी हो न अनुपम के घर पत्थर बाजी , कपिल सिब्बल का बयान की इससे क्या होगा क्या बिजली पानी स्कूल --सपना पूरा होगा सब लीपा पोती में लगे हैं अभी कमिटी नहीं बनी और --तो सोचिये आप का ड्राफ्ट ..अपराधी पकडे जाते हैं तो मुह उनका छिपा कर बचाया जाता है क़ानून कहता है जब तक अपराधी घोषित न हो ... हम तो कहते हैं की खुद से सुधरो -जहाँ भी रहो -जब अनाचार हो आवाज उठाओ-शोर मचाओ -मिल जुल कर -कष्ट सहो काम में देर होती है थोडा हो -कानून का ड्राफ्ट ऐसे ही गढ़ा तो जाता है मगर कुछ खामियां ऐसी रहेंगी बीस साल तक दागी नहीं होंगे चुनाव जीतेंगे मंत्री बनेगे पावर उनके हाथ लाठियां उनके हाथ -फिर जिसकी लाठी उसकी भैंस -अन्ना जी की तरह बेदाग बनना है -हजारों अन्ना ढूंढना है -युवा को चुनाव में भटकना नहीं है -तब जा के बात बने बधाई हो आप के ड्राफ्ट और लेख के लिए

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माला जी आपके द्वारा लिखित प्यार की परिभाषा से बहुत ही प्रभावित हुआ हूँ. जो ज्यों का त्यों आपके पोस्ट से नीचे पेस्ट कर रहा हूँ. लेकिन ये इतना आसान नहीं है पता करना. इसलिए अक्सर हम गलती कर बैठते है. इसलिए हम जैसे लोग बोलते है ये प्यार व्यार कुछ नहीं होता. क्योंकि अगर हम अपने प्यार को सही अंजाम तक नहीं पंहुचा सकते तो सिर्फ इतिहास मैं नाम दर्ज कराने के लिए प्यार करना कितना सही है?? "एक दिन हम प्रेम की परिभाषा यूँही सोचने लगे की कैसे पता करे की ये प्यार है की आकर्षण तब एक ही बात समझ आई की जब हम किसी के गुण से , पद से , रूप से यानी किसी कारण से प्रभावित होकर मोहित होते है तो ये आकर्षण है उस गुण का …. पर जब हम सोचे की क्यों हम उसे इतना पसंद करते है और कोई निश्चित उत्तर नही पाते है पर एक जुडाव महसूस करते है तो ये निसंदेह प्यार ही है ! पर इस निष्कर्ष पर पहुचने के लिए बहुत समय लेना चाहिए क्योकि आकर्षण और प्यार का अंतर समझने के लिए बहुत समय लगता है!"

के द्वारा: anujkaronsia anujkaronsia

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आज बड़े दुःख की बात है की अपने देश के लोग ही देश को तोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं. इन नेताओं को न तो देश की फिक्र है और न उसमें रह रहे अवाम की. अगर इन्हें ज़रा भी अक्ल होती तो कभी भी भारत से अलग होने के बारें में नहीं सोचते. क्यूंकि अलग होते ही यह जगह युध्क्षेत्र में तब्दील हो जाएगा और कश्मीर कहीं का न रहेगा. ऊपर से पाकिस्तान जो कुछ वहां पर है उसे भी बेच खुच कर ख़तम कर देगा. एक तो वहां पहले से ही सही नेतृत्व नहीं है.सभी जानते हैं दशकों से पाकिस्तान इस राज्य के रास्ते भारत को परेशान करने की कोशिश लगातार करता रहा है. और जो लोग इसे भारत से अलग करने की सोच रहे हैं वोह सही मायनों में कश्मीरियों को मार ही रहे हैं. इसमें कश्मीरियों का कभी कोई हित नहीं होगा. बेहतर है और देश के हित में होगा की कश्मीरी नेता और अवाम भारत में ही रहें. जय हिंद.

के द्वारा: jalal jalal

माला जी नमस्कार ,कश्मीर के कुछ अलगाववादी नेताओ के कारण आज कश्मीर की ऐसी स्थिति हैं. जम्मू -कश्मीर के मुख्यमंत्री का बयान काफी आपतिजनक हैं.जिस केन्द्रीय बल को वहा से हटाने की बात की जा रही हैं उसी ने कभी वहा की जनता का विश्वास जीता था. आज कुछ नेता सैनिक कानून में संशोधन की मांग कर रहे हैं जो अनुचित हैं . भारत की सबसे प्रतिष्ठित सेवा सिविल सर्विस में कश्मीर का बेटा टॉपर बनता हैं तब लोग कैसे यह सब सोच सकते हैं की कश्मीर भारत का अंग नहीं हैं. कश्मीर के अलगाववादी पाकिस्तान परस्त हैं वे विकाश नहीं चाहते हैं. वे कश्मीर को शांति की दौर में नहीं लाना चाहते हैं. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं. सरकार को अलगाववादी के खिलाफ कड़ी करवाई करनी चाहिए. जय हिंद जय भारत .राष्ट्रीय विषय पर अच्छा लेख. मैंने कुछ लेख लिखे हैं यदि आपको कभी फुर्सत मिले तो पढ़कर मुझे अपने शिकायतों और सुझाव से अवगत करावे. www.amitkrgupta.jagranjunction.com

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डेनियल जी कथा के प्रारम्भ से समापन तक आप स्वयम ही अवलोकन कीजिये,उक्त लेख में कथा का भाव नही वरन पत्रकारिता एवं नाट्य विधा की झलक दिख रही है ,मेरा उद्देश्य लेखिका महोदया की भावनावों को आहत करना नही है वरन एक कथाकार को कथाकार के कथाकार के रूप मैं परिपक्व होते देखना है ,परन्तु मेरे इस उद्देश्य में अगर आपके दिल को ठेश पहुंची है तो मै हृदय से शर्मिंदा हूँ |पुनश्च कुछ बिन्दुओं पर आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ (चारो तरफ फैले बरामदे )(हीन सा मानने)(ग्लानी का बोध)(रात में जग कर ड्रिप्स देखना ये ही लड़का करता है !’)गोया अनेकों ड्रिप लगी हों ,,उक्त कथा के उद्दीप्त करने वाले भावों पर मैने आलोचना के एक शब्द भी नही लिखे ,केवल कथा की विधा , अभिव्यक्ति एवं प्रस्तुत करने के तरीके पर ही आपत्ति की है |उपरोक्त (कोष्ठक बंद ) तीन शब्द विन्याशों पर ध्यान दीजिएगा ,फिर भी अगर मेरी आपत्ति आपको असहज लगी हो तो,मेरे पास आपको कहने के लिए कुछ शब्द शेष नही है |

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मैडम जी, किसी भी आयोजन के लिए बड़ी मेहनत और टीम वर्क की जरूरत होती है. ऐसा मत समझिये की जो गलतियाँ हमारे यहाँ हो रही हैं वो किसी और देश में नहीं हुई होंगी. होती है और उन्हें दूर भी किया जाता है. लेकिन अपने यहाँ मीडिया की नजर चमचमाते हुए स्टेडियम या कमरों पर न पड़ कर वहां पड़ती है जहाँ अमूमन गन्दगी दिख ही जाएगी. वैसे अगर इतना बड़ा भ्रस्टाचार था तो मीडिया ने पिछले साल से ही क्यूं नहीं पोल खोलो अभियान चलाया. आज जब सारे मेहमान देश में आ रहें है तो अपनी बड़ी बड़ी सनसनाती हुए बातों से बवाल खड़ा कर मीडिया अपने देश की इज्जत से भी खिलवाड़ कर रहा है. आप मैडम जी ब्लॉग लिखने के बजाय एक बार खुद delhi जाकर देखिये. हकीकत कुछ अलग ही दिखेगा.

के द्वारा: kaushalvijai kaushalvijai

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

के द्वारा: vijendrasingh vijendrasingh

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

माला जी संसद में हाल में घटी ये घटना आपका ही नहीं इस वक़्त पूरे देश की टीस बना हुआ है । इन तथाकथित रूप से हमारे सेवकों को महंगाई के अनुरूप अपना वेतन खुद बढ़ा लेना तो याद है, लेकिन वही महंगाई उनको वोट देने के लिये लाइन लगाने वालों के जठर को किस क़दर जलाए डाल रही है, इसपर द्रवित होने की बजाय ये सेंट्रल हाँल में क्रूर अट्टहास कर रहे हैं । अब इनके नाटक का सीधा प्रसारण ज़रा भी नहीं भाता, बल्कि खीझ और आक्रोश पैदा होता है । इन्हें आपके आक्रोश की कोई खास चिन्ता भी नहीं है, ये घाघ जानते हैं कि जोड़-तोड़ कर अपने दोबारा पहुंचने की जुगाड़ ये लगा ही लेंगे । जब तक त्रस्त और भूखे लोग इनसे सड़कों पर नहीं निपटते, ये कभी नहीं समझेंगे ।

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माला , आप कविताये लिखती रही है और बहुत बढ़िया लिखती है इस पोस्ट को लिखने के पीछे का कारण शायद यह रहा है कि आप की दीदी की शादी मात्र दहेज के कारण टूट गयी और कारण था अपने से ऊँचे घर में अपनी बेटी की शादी का सपना देखना उसका खामियाजा आपके परिवार को भुगतना पड़ा और आपको लगा कि इससे बढ़िया प्रेम -विवाह की अनुमति सबको मिलनी चाहिए मगर आप यह सोचिये इस विवाह में तो फिर भी सामने वाले का असली चेहरा सबके सामने आ गया प्रेम -विवाह में तो शादी के बाद ही उस घर -परिवार की असलियत सामने आती है इस लिए विवाह एक जुआं है इसमें किसी बात की कोई गारंटी नहीं है दुखी मत होइए भगवान पर भरोसा रखिये सब ठीक हो जायेगा

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आज युवा घर से भाग कर शादी कर लेते हैं और बाद में उनकी जिंदगी नरक में बदल जाती है। कई युवा तो प्रेम विवाह असफल हो जाने के बाद आत्‍महत्‍या तक कर लेते हैं। दुनिया में प्रेम सिर्फ किताबों और सिनेमा तक ही अच्‍छा लगता है। उसके बाद सामाजिक स्‍तर पर इसमें काफी गिरावट आ गई है। आज के युवा प्रेम, आकर्षण और वासना में फर्क करना नहीं जानते। एक बात और, जाति बंधन तोड कर विवाह करने के दुष्‍परिणामों से दुनिया अनजान नहीं है। मैं ऑनर किलिंग के पक्ष में नहीं हूं, यदि किसी ने शादी कर ली हो तो उसे तंग नहीं करना चाहिए। परंतु फ‍िर भी समाज में प्रेम में बंदिश अवश्‍य लगनी चाहिए। प्रेम दुनिया की सबसे वाहियात चीज है।

के द्वारा: anand17 anand17

कुछ भी नाम दे दो, हत्या तो हत्या ही है. ये आज का कटु सच है की लोग अपनी लड़कियों के करिएर के प्रति चिंतित हैं उसका कारण मात्र उनकी भलाई नहीं है बल्कि ये चिंता भी है, वही पुरातन चिंता, की कैसे उनकी बेटी की शादी होगी. आज वैवाहिक विज्ञापन देखें तो पता चलता है कि हर कोई अपने पुत्र के लिए प्रोफेसनली क्वालीफाइड पुत्रवधू ही चाहता है. और इन विज्ञापनों के पीछे भी वही लोभ है जिसका आपने जिक्र किया है, उन्हें अपने स्टेट्स का ग्राफ ऊँचा करना है. इतने लोभ के वशीभूत व्यक्ति का जब लोभ तुस्टीकरण का जरिया ख़त्म होता है तो उसकी प्रतिक्रिया में जन्मा क्रोध, कुछ लड़कियों की स्वतंत्र निर्णय लेने से नाराजगी (जो उनके प्रेम विवाह करने के कारण पैरेंट्स को लगता है) और कुछ हद तक समाज का डर (जो शायद आज किसी को नहीं है) इन पैरेंट्स को आनर किलिंग्स को तत्पर करने लगने वाले कारक लगते हैं. आपने बिलकुल सही कहा है, इसका तोड़ सिर्फ और सिर्फ अंतरजातीय विवाह है. हम युवा ही आगे बढ़कर इस वदलाव को ला सकते हैं, क्योंकि सिर्फ बूढ़े पैरेंट्स नहीं कोई ना कोई युवा का इस ह्त्या में हाथ जरूर होता है. अच्छा लेख, अच्छा विषय. बधाई माला जी.

के द्वारा: deepaksrivastava deepaksrivastava

आपकी सोच हम युवाओं की सोच का पर्याय है. साथ ही ये इस बात को भी साबित करता है की हमारा कुछ नहीं किया जा सकता. क्यूँ, क्यूंकि हम सोचते हैं, की हमने जो बात कही वो बेवकूफ उम्रदराज लोगों के समझ के बाहर है. हम yuva हैं भाई, २१वीन सदी के युवा, हाई-टेक युवा, फटाफट जेनरेशन के युवा. ओनर किलिंग, काफी समय से विवादित है यह दो शब्दों का झुण्ड. कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है इस पर. मैं आपकी इस बात को मानता हूँ की दहेज़ रूपी दानव अभी भी हावी है हमारे समाज पर. प्रेम विवाह से भी मुझे कोई ऐतराज नहीं. लेकिन आपने कभी सोचा की ये ओनर किलिंग शब्द कहाँ से आया, हम युवाओं ने ही इसकी खोज की है, हमें पूरी आज़ादी चाहिए, हमें लिव इन रिलेशनशिप चाहिए, हमें होमो सेक्सुअल रिलेशनशिप को भी मान्यता दिलानी है, हमर जो मन होगा वो हम करेंगे, हमें सवतंत्रता चाहिए, क्यूँ, क्यूंकि हम स्वतंत्र भारत में रह रहे हैं. लेकिन एक बात साफ़ कर देना चाहूँगा, हिंदी में दो शब्द हैं, स्वतंत्रता और सछान्दाता, अब आप ये बताएं की आपको क्या चाहिए, स्वतंत्रता या स्वछंदता, शुनव आपको ही करना है. इसी विषय पर एक बहुत ही बेहतरीन कहानी लिखी थी सीमा जी ने, अब पछताए क्या होत, ज़रूर पढ़ें. आपका लेख ओनर किलिंग के विरोध के साथ-साथ प्रेम विवाह की भी वकालत है. मेरे संज्ञान से आजतक जितने भी प्रेम-विवाह देखें हैं मैंने उसमें से ९० प्रतिशत जोड़े असफाक हैं, चूँकि मैं भी की तरह इसी पीढ़ी का हूँ, कई मित्र हैं जिन्होंने प्रेम विवाह किया है, उनके परिवार वालों की मर्जी से. सम्बन्ध प्रेम से बनता है न की सम्बन्ध बनाते की विभिन्न तरीकों से. और जहाँ तक रहा दहेज़ का सवाल, मैं कई ऐसे वाकये देख चूका हूँ, जहाँ लड़के वालों ने दहेज़ लेने से मन किया लेकिन लड़की, जिसकी शादी हो रही थी उसे उसके हक़ के रूप में दहेज़ चाहिए था. अब ऐसे में दहेज़ तो बंद नहीं होगा. दहेज़ को रोकने का एक ही हल है, समूल बहिष्कार. और एक बात और, प्रेम विवाह इस बात की गारंटी नहीं की दहेज़ के लिए महिला को पीड़ित नहीं किया जाएगा. आभार, निखिल झा

के द्वारा: Nikhil Nikhil

के द्वारा: brijeshkumar brijeshkumar

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

माला जी, आपका पोस्ट पढ़कर आपकियो व्यथा का सहज ही अंदाजा हो जाता है | आपने पुलिस और लफंगों की चरित्रहीनता का खेल अपनी आँखों से देखा तो आपसे रहा नहीं गया | जिस अंदाज़ में आपने लफंगों का पीछा किया और उन्हें सिनेमा हाल में तलाश कर रही थी पढ़कर आपकी नासमझी पर हंसी भी आई और आपके साहस पर ख़ुशी भी हुई | मेरी व्यक्तिगत राय है कि दुबारा ऐसा मत करियेगा | इसलिए नहीं कि आप कमजोर हैं या आप डर जाइये बल्कि इसलिए कि आप परछाइयों के पीछे भाग रहीं थी | वास्तविक गंदगी वहां नहीं है बल्कि कहीं ऊपर समाई है जो इसे प्रोत्साहन एवं समर्थन देती है, वर्ना गंज जैसे हाई-सेक्योरिटी इलाके में क्या कोई ऐसी हिमाकत कर सकता है ? वैसे एक प्रश्न जो आपने नहीं उठाया सिर्फ 'जनता से हमें कोई उम्मीद नहीं थी' कह कर छोड़ दिया, मैं पूछता हूँ- महानगरों के हालत इतने बदतर हो गए हैं कि हर कोने से सड़ांध आती है | क्या एक छोटे से शहर या कस्बे में खुले आम ये संभव था ? नहीं | उन शोहदों को आपने जैसे ही जवाब दिया था उसी के साथ लात-जूतों पर रख लिया जाता | लेकिन पैसे की चमक में अपना चरित्र बेच चुके लोगों में आत्मा और गैरत नहीं पाई जाती | आपको इन मुर्दों को साथ या तो सामंजस्य बना कर रहना सीख लेना होगा या फिर सच्चाई और चरित्र का पतन करने वाली हर व्यवस्था के विरुद्ध बोलना होगा | मैं आपको हिंसक होने को नहीं कहूँगा लेकिन ये जरूर कहूँगा कि जो गलत है उसे गलत कहो तो अब वो गलती कोई भी करे चाहे वो समाज हो, क़ानून हो, न्यायालय हो या के हम स्वयं | आइये जोड़े कुछ ऐसे हिन्दुस्तानियों को जो चरित्र, नैतिकता, और राष्ट्र की मर्यादा समझते हों | जिनमे अभी आत्मा जिन्दा है नोटों के आगे जिन्होंने गैरत बेचीं नहीं हैं | निराशा की बात नहीं हम सफल होंगे | आपकी पोस्ट सराहनीय है, बधाई |

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\"ॐ\" आपने एक ऐसा मुद्दा ले लिया जिससे में भी दो-तीन बार रूबरू हुआ हु. सच.! आपने दिल, दिमाग, समाज, आत्मा और परिस्थतियो के बीच चलने वाले झंजावत को ब्लॉग पर डाल कर अच्छा ही किया. इच्छा म्रत्यु को क़ानूनी जामा पहनाने से परिजनों को अपनी आत्मा और समाज के दवाब से मुक्ति मिलेगी. टिप्पणी करना और उस परिस्तिथि से गुजरना बिलकुल अलग-२ पहलु है.इसलिए मेरी माला जी के ब्लॉग पर टिप्पणी करने वाले रीडर से अनुरोध है की यदि वो या उनका कोई निकटस्थ उस परिस्तिथि से गुजर चुका हो तभी टिप्पणी करे, अन्यथा सही निष्कर्ष निकलने के बजाय फिर से उलझन में पड़ जायेंगे. अंतत: में अपना मत सुश्री माला जी की बात से सहमती में दूंगा, हालाकि में जानता हु उपरोक्त लेख को लिखते समय वो भी किस झंजावत से गुजरी होंगी, बल्कि इसके लिए उनपर \'निर्दयी\' \'असंवेदनशील\' होने के जो आरोप लगेंगे निश्चय ही वे इसके लाये मानसिक रूप से तैयार है. में उन्हें इस ब्लॉग के लिए बहुत धन्यवाद देना चाहता हु.मथुरा के MLA श्री प्रदीप माथुर के निजी सचिव बतौर मेने ऐसे कुछ केस का सामना किया है,आखे रो-रो आई पर हम कुछ कर न सके. इस लेख ने फिर से वो मंजर याद दिला दिए, हे इश्वर मुझे नहीं मालूम को वो अब कहा और कैसे है? पर अब में ये प्रार्थना करने में अपने को दोषी नहीं मानता की-\"हे परमेश्वर उन्हें वापस बुला लो\" (शिब्बू आर्य-मथुरा)

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के द्वारा: brijeshkumar brijeshkumar

आपने मात्र कमिया क्यों देखी है...नारी के जीवन में ..क्या केवल यही मात्र नारी की परिभाषा है ... आप लोग क्या ये मानती है की पुरुष मात्र शोषक और नारी मात्र शोषित है ...एक बात आपको बताना चाहूँगा ..की अगर सामाजिक व्यवस्था की एकमात्र सचाई यहो होती तो भारत का समाज इतने लम्बे समय तक सुदृढ़ नहीं रहता ..... और इतिहास में धुल में मिल चुकी तमाम समकालीन सभ्यताओ की तरह भारत भी कही इतिहास बन गया होता.... मगर हमारे समाज में ऐसे तत्त्व थे जो वैज्ञानिक थे और जिनके पीछे दूर दृष्टि थी ....समस्याए हर समाज में होती है.. हम नारी की स्थिति को इतना ज्यादा बुरा मान रहे है क्योकि हम साड़ी समस्याओ को आर्थिक विकास से जोड़ कर देहते है मगर विकास का मतलब केवल आर्थिक विकास नहीं होता ..और अआप की बात सही है की एक लड़की को हमारी सामाजिक व्यवस्था में काई समस्याए है मगर सिर्फ समस्याए ही नहीं है निश्चित रूप से महिलाओ की आर्थिक स्वतंत्रता जरुरी है आज की तारीख में ... पर क्या ये नहीं लगता की मात्र आर्थिक विकास की दौड़ में हम कुछ खोते जा रहे है.... कुछ ऐसा जो बहुत कीमती है ................

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आपने अपना पूरा नाम नहीं लिखा अतः संबोधन ....की समस्या है.....बहरहाल आपका लेख बहुत ही अच्छा लगा .......आज प्यार के मायने बहुत बदल चुके है ... भावना की जगह व्यावहारिकता ने और और समर्पण की जगह अनुबंध ने..... क्योकि दुनिया बहुत तेज हो गई है और हमें सबकुछ तुरंत चाहिए.....हम इंतज़ार नहीं कर सकते , ऐसे में चीजे बदलेंगी उनकी परिभाषा बदलेगी ....क्योकि हम चाहे या न चाहे माने या न माने बाजारीकरण में मात्र उपभोक्ता रह गए है .और हमारे सभी क्रियाकलाप .... सुबह ब्रश करने से लेकर रात में सोने तक सबकुछ बाजार नियंत्रित कर रहा है ....पर ये भी कहूँगा प्यार शब्द अधुरा ही सही , असफल ही सही अगर हम उसके अधूरे अर्थ को भी समझ सके है तो जीवन को एक दिशा मिल ही जाती है ..एक सकारत्मक दिशा .....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

श्रीवास्तव जी, लेख को पढ़कर लगता है की आरक्षण की त्रासदी से आप भी रु-ब-रु हैं | सोच गहरी और उम्दा होने के साथ -साथ प्रेरणादायक भी है | पर आपको ऐसा नहीं लगता की हमारे इतिहास में कहीं चूक हो गयी तभी ये हालात है | विशेषत: आरक्षण का लाभ लेने वाले 'शोषित वर्ग' को यह सुविधा महज ६ दशकों से ही मिल रही है पर उन्होंने शोषण का जहर सदियों पिया है | चूँकि समय गुजर चुका है और सिवाय पढने के, हम वो दर्द कभी महसूस नहीं कर सकते जो उन्हें गुजरे वक़्त में हुआ | हिंदी की लोकोक्ति है 'जाके पैर न फटी बंवाई ता का जाने पीर पराई' | आज मुजस्सिम सामने पाकर सभी घबरा गए हैं | और अपनी भूल स्वीकारने को कोई तैयार नहीं | बहरहाल , आपका लेख हमारी राजनैतिक व्यवस्था और संविधान में कमी को स्पष्ट करता है | लेखन जारी रखें , ईश्वर सदा आपकी मनोकामना पूर्ण करें | धन्यवाद |

के द्वारा: ASHISH RAJVANSHI ASHISH RAJVANSHI




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